अंतर पश्चिमी समाज और भारत की विरासत में

बीबीसी टेलिविजन ने 10 सितंबर, 1995 की सायं से एक धारावाहिक का प्रसारण शुरू किया था--'विरासत'। जिसका विषय था--'भारत की लंबी ऐतिहासिक यात्रा की मूल प्रेरणा और अंतरात्मा'। वैदिक युग से लेकर अशोक, अकबर और नेहरू आदि मील के पत्थरों के माध्यम से उस प्रसारण ने अत्यंत प्रभावी ढंग से भारत और भारतीय संस्कारों का समर्थन किया कि अध्यात्म और उसमें से निष्पन्न श्रेष्ठ मानवीय मूल्य ही भारत की मूल आत्मा हैं, भारत की मूल प्रेरणा हैं। अशोक के अभिलेखों में अभिव्यक्त उदात्त भावनाओं और उसके लिए प्रयुक्त शब्दों का उदाहरण देकर उस धारावाहिक का लेखक समूची मानव-जाति और विशेषत: पश्चिमी समाजों का अह्वान करता है कि यही भाव है, यही शब्दावली है जिसके लिए आज का मानव-मन छटपटा रहा है।

बीबीसी. का कैमरा हमें इलाहाबाद में अब नेहरू परिवार का संग्रहालय बना दिये गये 'आनन्द भवन' के उस कमरे तक ले जाता है जहां नेहरू रहते-सोते थे। उद्घोषक बताता है कि यही कमरा है, जहा वर्षों तक घंटों बहस होती थी कि स्वाधीन भारत किधर जायेगा, उसका चित्र क्या होगा? नेहरू स्वयं को पश्चिमी सभ्यता की उपज और उसका प्रतिनिधि मानते थे, इसलिए उनकी सोच पर पश्चिम से प्राप्त दृष्ति का प्रभाव अधिक था, किन्तु इस पाश्चात्य प्रभाव के नीचे उनके अचेतन मन में कहीं-न-कहीं एक परत भारतीयता की भी थी। कैमरा, हमारी दृष्टि नेहरू की चारपाई के निकट मेज पर रखी एक पुस्तक पर केंद्रित करता है जिसकी हालत बताती है कि शायद इसे रोज पढ़ा जाता था और वह पुस्तक है भगवद्गीता। उद्घोषक कहता है कि यह पुस्तक भारत की अंतरात्मा का स्वर है, जो स्वयं को नास्तिक बताने वाले नेहरू को भी आकर्षित करती थी, शायद अनुप्राणित भी करती थी।

धारावाहिक की कमेंट्री से ऐसा लगता है कि इसका मुख्य लक्ष्य 'अर्थ' और 'काम' की भँवर में फँसा पश्चिमी समाज है। वह बार-बार स्मरण दिलाता है कि आधुनिक पश्चिम अपने जिन आदर्शों को अंतिम मान बैठा है, वे उसे गलत दिशा में ले जा रहे हैं, उन पर पुनर्विचार करना आवश्यक है और इसके लिए पश्चिमी और पूर्वी सभ्यताओं की अंतरात्मा को समझना होगा। धारावाहिक के इस अंक का निष्कर्ष है--'भारत की अंतरात्मा को समझे बिना पश्चिम सही दिशा को नहीं खोज पायेगा।'

यहाँ बीबीसी. के उक्त धारावाहिक का उल्लेख करने का अभिप्राय मात्र इतना है कि भारत एक महान उदात्त विरासत का उत्तराधिकारी है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, "इस अमूल्य विरासत को विश्व को सौंपने के लिए ही पराधीनता की लंबी कालरात्रियों से जूझ कर भी भारत जीवित रहा है।" उनका विश्वास था, "इस विरासत को सौंपे बिना भारत मरेगा ही नहीं।"

पिछले 50-60 वर्षों का इतिहास साक्षी है कि इस विरासत ने पश्चिम के मन को आकर्षित किया है। कितने ही पश्चिमी युवा आध्यात्मिक शांति देने वाले गुरु की खोज में भारत में भटकते देखे जाते हैं और अनेक भारतीय गुरु, भगवा वस्त्र धारण कर, इस विरासत द्वारा प्रदत्त शब्दावली को अंग्रेजी भाषा में प्रभावी ढंग से दोहराने की क्षमता अर्जित करके पश्चिम की यात्रा करते हैं, आध्यात्मिक शांति के भूखे पश्चिमी मन को अपनी ओर आकर्षित करते हैं और पश्चिम से चेलों की भीड़ को भारत में प्रदर्षित करके अपने प्रभाव का आभास पैदा करते हैं।